Thursday, 16 March 2017

दम तोड़ते छोटे अहसास

ठूँस ठूँस कर भरी गई बसों रेलों और अनधिकृत वाहनों के रेले के बीच जब हम ये खबर पाते हैं कि हमारे वैज्ञानिकों ने रॉकेट में भी एक साथ 104 उपग्रहों को ठसाठस भरके सफलतापूर्व प्रक्षेपण करने में कामयाबी हासिल कर ली तो एक सुखद अहसास होता है । अपने आसपास फैली हुई छोटी छोटी नाकामियों को भूलकर  ये सोचकर हम अपना सिर गर्व से ऊँचा करते हैं कि हम बस रेल ही नहीँ रॉकेट भी ठूँस ठूँस कर भर देने में माहिर हैं।  जरूरी भी है ।आखिर पुरे राष्ट्र का गौरव है बड़ी उपलब्धियां ।लेकिन रॉकेट ठूंसना गौरव है और बस रेल ठूँस ठूँस कर भरना अभी तक पर्याप्त विकास न हो पाने का संकेत भी।
मै जब भी किसी मजदूर को फावड़े से मिटटी खोदते ,एक किसान को परम्परागत तरीके से खेती में काम करते,एक कारीगर को अपर्याप्त आधुनिक औजारों  के साथ काम करते देखता हूँ तो मुझे महसूस होता है कि मशीनों के इस युग में एक बड़ा तबका आज भी अपनी कार्यकुशलता को खुद के दम पर बढ़ाने में नाकामयाब है और आधुनिक तकनीक के अभाव में जिन मजदूरों किसानों की आमदनी बढ़ सकती थी  वो नहीँ बढ़ पाई है क्योंकि ये तबका खुद के दम पर कुछ कर पाने में असमर्थ है क्योंकि इनमें से अधिकांश के पास तकनीकी ज्ञान नहीँ या जज्बा नहीँ  या आर्थिक सक्षमता नहीँ।और ये सिर्फ अपनी आजीविका दो वक्त की रोटी कपड़ा और मकान में ही उलझ कर रह जाते हैं।देश के नींव को मजबूती देने वाली ईंटे जमीन में ही दबकर रह जाती हैं अपने नशीब और एक मूक अहसास के साथ।